1500 साल पुराने सोमनाथ मंदिर के प्रांगण में बने तीर-स्तंभ की विशेषताएं? फिर भी सोमनाथ मंदिर का इतिहास बहुत ही अजीब और गौरवशाली रहा है। 12 ज्योतिर्लिंगों में सोमनाथ पहला ज्योतिर्लिंग है। सोमनाथ मंदिर पर कई बार हमला किया गया और लूटा गया!आक्रमणकारियों ने सोना, चांदी, हीरे, माणिक, मोती आदि छीन लिए। इतनी दौलत लूट कर भी सोमनाथ का शिवालय हर बार उसी वैभव के साथ खड़ा रहा! लेकिन सोमनाथ का महत्व सिर्फ इस वैभव के कारण नहीं है !!


सोमनाथ का मंदिर भारत के पश्चिमी तट पर है और हजारों वर्षों के ज्ञात इतिहास में इस अरब सागर ने कभी अपनी सीमा नहीं लांघी !! न जाने कितने तूफ़ान आए, तूफ़ान आए लेकिन कोई तूफ़ान, तूफ़ान, चक्रवात ने मंदिर को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया!!!

इस मंदिर के परिसर में एक स्तंभ है जिसे "बनस्तंभ" के नाम से जाना जाता है। यह कॉलम कब स्थित है, यह दिखाना बहुत मुश्किल है। इस स्तंभ का नाम 6वीं शताब्दी के आसपास के इतिहास में दर्ज है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि तीर का स्तंभ छठी शताब्दी में बनाया गया था !!! ऐसा माना जाता है कि इसका गठन सैकड़ों साल पहले हुआ था।

यह एक दिशात्मक स्तंभ है जिसमें एक तीर समुद्र की ओर इशारा करता है। स्तंभ पर शिलालेख में लिखा है - "दक्षिणी ध्रुव के लिए अखंड चंद्र पथ" जिसका अर्थ है - "इस बिंदु से दक्षिणी ध्रुव तक एक सीधी रेखा में एक भी बाधा नहीं है" अर्थात, "इसमें भूमि का एक भी टुकड़ा नहीं है" यह पूरी दूरी।" ।

जब लोग इस कॉलम के बारे में पहली बार पढ़ते हैं, तो उनका सिर चकराने लगता है!!! क्या इतने साल पहले भारतीयों को यह ज्ञान था? यह कैसे संभव है? और शायद यह भी सच है कि समृद्ध ज्ञान की विश्व धरोहर ने हमें कितना समझाया !!! संस्कृत में लिखी गई इस रेखा के अर्थ में कई सूक्ष्म अर्थ हैं...... इस रेखा का सरल अर्थ यह है कि यदि सोमनाथ मंदिर के बिंदु से दक्षिणी ध्रुव (अर्थात अंटार्कटिका) तक एक सीधी रेखा खींची जाए तो कोई भूमि नहीं आती है। के बीच....!!!

क्या ये सच है? आज के सिस्टम साइंस के युग में इसे खोजना संभव है, लेकिन यह इतना आसान नहीं है!!! अगर आप गूगल मैप में सर्च करते हैं तो प्लॉट नजर नहीं आता लेकिन छोटे प्लॉट देखने के लिए आपको मैप को बड़ा करना होगा। धैर्य से देखें तो एक भी प्लाट नहीं आता यानी आपको पूरा विश्वास होना चाहिए कि इस श्लोक में सच्चाई है !!!

लेकिन फिर भी मूल प्रश्न वही रहता है। यदि हम मान भी लें कि स्तंभ का निर्माण वर्ष ५०० में हुआ था, तो हमें यह ज्ञान कहाँ से मिला कि पृथ्वी उस समय दक्षिणी ध्रुव है? खैर .... यह मानकर भी कि दक्षिणी ध्रुव को पता था, किसने मैपिंग की कि सोमनाथ मंदिर से दक्षिणी ध्रुव तक भूमि एक सीधी रेखा में नहीं आती है? कैसे किया

सबकुछ अद्भुत है !!! इसका मतलब है कि "स्तंभ" के निर्माण के दौरान भारतीयों को यह ज्ञान था कि पृथ्वी गोल है। इतना ही नहीं, पृथ्वी का दक्षिणी ध्रुव (अर्थात उत्तरी ध्रुव भी है) भी ज्ञान था!!!यह कैसे संभव हुआ? पृथ्वी के "हवाई दृश्य" के लिए कौन सा उपकरण उपलब्ध था? या पृथ्वी का विकसित नक्शा बन गया?

अंग्रेजी में "कार्टोग्राफी" नामक मानचित्र बनाने का एक विज्ञान है (यह मूल रूप से एक फ्रेंच शब्द है)! यह प्राचीन ग्रंथ है। यीशु से पहले ६,००० से ७,००० साल के बीच में आकाश में ग्रहों और तारों के नक्शे गुफाओं में मिले थे, लेकिन पृथ्वी का पहला नक्शा किसने बनाया इस पर कोई सहमति नहीं है!

चूँकि हमारे भारतीय ज्ञान का कोई प्रमाण नहीं है, इसलिए यह सम्मान "एनेक्सिमेंडर" नामक यूनानी वैज्ञानिक को दिया जाता है। उनका कार्यकाल ९११ ईसा पूर्व से ६ साल ईसा पूर्व तक था, लेकिन उन्होंने जो नक्शा बनाया वह अपनी प्रारंभिक अवस्था में था! उन दिनों जहां मानव निवास का ज्ञान होता था, मानचित्र पर इतना ही दिखाया जाता था। इसलिए उस नक्शे में उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों को दिखाने का कोई कारण नहीं था। नक्शा जो आज की दुनिया को वास्तविकता के करीब लाता है, मूल रूप से 160 ईस्वी के आसपास "हेनरिक मार्टेलस" द्वारा बनाया गया था! ऐसा माना जाता है कि कोलंबस और वास्को डी गामा ने इसी नक्शे के आधार पर अपनी यात्रा तय की थी !! "पृथ्वी गोल है" का यह विचार यूरोप के कुछ वैज्ञानिकों ने व्यक्त किया था। "एनेक्सेमेंडर" (500 ईसा पूर्व) ने पृथ्वी को एक सिलेंडर माना। अरस्तू (6-7 ईसा पूर्व) भी पृथ्वी को गोल मानते थे।

लेकिन यह ज्ञान भारत में अनादि काल से रहा है और इसका प्रमाण भी हमें मिलता है। इसी ज्ञान के आधार पर आगे बढ़ते हुए आर्यभट्ट ने इस गोल पृथ्वी का व्यास लगभग ५०० के आस-पास लगाने की योजना बनाई है। (अर्थात नए मापदंड के अनुसार 3 किलोमीटर) भी मजबूती से दिखाया गया है। आज की अत्याधुनिक तकनीक की मदद से पृथ्वी का व्यास 200 किमी माना जाता है। इसका मतलब है कि आर्यभट्ट के आकलन में केवल 0.5% का अंतर है जिसे नजरअंदाज किया जा सकता है। लगभग डेढ़ हजार साल पहले आर्यभट्ट को यह ज्ञान कहाँ से मिला था?

वर्ष २००६ में प्रसिद्ध जर्मन इतिहासकार जोसेफ श्वार्ट्जबर्ग ने यह साबित कर दिया कि कार्टोग्राफी भारत में ढाई हजार साल पहले ही अत्यधिक विकसित हुई थी! उस समय टाउन प्लानिंग के नक्शे उपलब्ध थे, लेकिन नौकायन के लिए आवश्यक नक्शे भी थे। भारत में नेविगेशन का विकास प्राचीन काल से होता आ रहा है। जिस तरह से पूरे दक्षिण एशिया में हिंदू संस्कृति की छाप देखी जा सकती है, उससे पता चलता है कि भारतीय जहाज जावा, सुमात्रा और यवनद्वीप को पार करते हुए पूर्व की ओर जापान जाते थे। गुजरात के "लोथल" में ढाई हजार साल पहले के अवशेष मिले हैं।

यह निश्चित है कि सोमनाथ मंदिर की दिशा दक्षिणी ध्रुव की ओर उस समय के भारतीयों को दी गई थी। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सवाल जो दिमाग में आता है वह यह है कि दक्षिणी ध्रुव तक सीधी रेखा में समुद्र में कोई रुकावट नहीं है।